10 अक्टूबर 2011

कदम बढ़ाते हैं

जैसे ही कदम बढ़ाते हैं
अधूरा ख्वाब रोक लेता है
इतनी कसक की कहीं छूट
न जाये और मिल मिलाये
अंधियारे में,
फिर भी कदम बढ़ाते हैं
और थक से जाते हैं
आज अलग है
न जाने कल कैसा होगा
एक नयापन सा है
कदम रखते ही
इस बीच एक असमंजस सा है
 





 

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