जैसे ही कदम बढ़ाते हैं
अधूरा ख्वाब रोक लेता है
इतनी कसक की कहीं छूट
न जाये और मिल मिलाये
अंधियारे में,
फिर भी कदम बढ़ाते हैं
और थक से जाते हैं
आज अलग है
न जाने कल कैसा होगा
एक नयापन सा है
कदम रखते ही
अधूरा ख्वाब रोक लेता है
इतनी कसक की कहीं छूट
न जाये और मिल मिलाये
अंधियारे में,
फिर भी कदम बढ़ाते हैं
और थक से जाते हैं
आज अलग है
न जाने कल कैसा होगा
एक नयापन सा है
कदम रखते ही
इस बीच एक असमंजस सा है
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें