लगाव
अनुभूतियों के विस्मृत-अविस्मृत पल जो कि अबाध गतिविधियों के साथ अग्रसर होता है |
14 दिसंबर 2010
आज फिर से
आज
आज
कुछ सोचा
समझा बैठकर
कुछ कहूं
करूँ
फिर भी
इतनी
कशमकश के बाद
कोई हल
नहीं निकल
पाया
हमेशा इसी
सोच में कि
कभी तो आज
ठीक होगा.
मुकेश नेगी
15 -12-2010.
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