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11 मई 2012

हकीकतें

 मैं
जब भी सोचता हूँ

कि कितना अलग
सा लगता है
हकीकत से हटना
ओर  सामना करना

कहीं नया रंग रूप
नजर नहीं आता है
बदला  बदला धुंधलापन
बादल सा नजर आता है
जहाँ बदलना हकीकत
सा बन जाता है

मैं  समझ नहीं पाता
कि वहाँ कौन खड़ा है
मझधार में

जहाँ हम
एक दूसरे से अपने को
रूबरू होते हुये देखते
हैं सफर में जाने
पहचाने ।


2 अक्टूबर 2011

हालात

हालात न जाने क्यूँ
मजबूर  कर देता 
विकट परिस्थितियों में

बढते  हुये कदम को
पीछे हटाना पडता है
कोई ठिकाना न होता 


हम हो जाते हैं हालात 
से मजबूर इस कधर |

अहसास

अहसास इस बात का
कहना चाहता हूँ
अपना कहीं कोई
मिले कह नहीं पाता

कहना चाहता हूँ
जो समझ पाये मुझे
कहूँगा जब कोई
अपना समझे
सिर्फ अहसास
इस बात का कि
कोई समझ पाये |

1 अक्टूबर 2011

ठिठुरते हुये मौसम में
कंपकंपाता ठिठुरन
से बढ़ता तनाव
न  जाने कब तक चलेगा
सर्द मौसम के आगोश में
कभी  शरीर को तरोताजा करे
ओर कभी मनमोहक दृश्य
ठंडी हवाएं  और शीतलहर
से ठिठुरता सामान्य जन |


23 सितंबर 2011

कशमकश

बड़ी मुदतों के बाद
कशमकश जगाता
मन की गहराइयों में
आदर्श की कसौटी
को तराशता जहाँ है
स्वर्ग सा नजारा 
निर्धनता, अशिक्षा,
बेरोजगारी के स्वरूप 
को निहारता,
जहाँ व्याप्त अभिशाप,
पाप कुंठायें
और रूढ़ियाँ मचाता है 
हलचल  सा हृदय
 

3 सितंबर 2011

बारिशों में

सिमट से जाते हैं 
हम इस व्यस्तता
 के दौर से,  हम बारिश
में रुक से जाते हैं  |
 
 













1 सितंबर 2011

अपरिचित रह जाते हैं


हम अपरिचित से रह जाते
हर  समय और गिनते हैं
इंतज़ार  की गढ़ियों को
जिसमे  सिमट जाते हैं
अनेकों  पल परिचितों
एवम अपरिचितों  के साथ
चलते चलते और
सिमट जाते हैं तलाश में
नये  सवेरा की ओर
न जाने अब की गढ़ी
में  कौन सा मंजर होगा
इस  इंतज़ार की गढ़ी में
और रह जाते हैं अपरिचित


31 अगस्त 2011

स्वप्नलोक

गहरी नींद में
विचारों का बोझ बुनता
 तरह-तरह के  स्वप्न

कभी मन को कचोटता
कभी  पैदा करता उल्लास
विचारों के  गलियारों में


भवन निर्माण की तरह 
गुजरता समय, टूट सा जाता
 भूकंप की तरह स्वप्न

कभी हताश सा रह जाता स्वप्न
 ऐसा है अद्यतन मानवता का |



 

19 अगस्त 2011

नया दौर है

इस नये दौर में
बस समझना बाकि
रह गया है

अहसास  नये दौर का
कि  किस तरह कदम
आगे बढे

अहसास  इस बात
का कि अकेलेपन की
जगह अपनापन

कहीं न कहीं मौजूद हो
एक नया दौर है |










13 अगस्त 2011

दिनचर्या

  पढ़ते देखते
दिनचर्या से
  पढ़ते पढ़ते 
हम लिखना 
ही भूल गए

आलसी बन कर
  भी हम थक
से जाते हैं
इन  रूहाइयों से
  दिनचर्या से
 ओर फिर भूल
  से जाते हैं |


   

23 जुलाई 2011

यादों के साये में

यादों के साये
हम संजोकर रखते हैं यादों
को जीते हैं हम यादों के साये

तन्हाईयों में यादें ही रहती है
हमारे साथ झुरमुटों की तरह

यादें बचपन, स्कूल, महफिलों
और मित्रों की जिसे हर समय
निहारते हैं आहिने के रूप में

करवटें बदलते हुए हर समय
और इसी तरह बीत जाते हैं
जीवन के लम्हे

मुकेश नेगी, १४-०५-२०११.

29 जून 2011

सोचता हूँ

मैं सोचता हूँ  कि
ख्यालों में सोचने से
यूँ ही दिन निकल जाते हैं
कभी बारिश की फुआरों तो 
कभी हवाओं के झोंकों से
इसी तरह ढेर सारे
प्रश्नों को अपने आप
से पूछते हुये कोई    
उतर नहीं निकलते |
  


28 जून 2011

परम्परायें

बदलते परिवेश के
लगातार परम्पराओं के
आँगन में

मौसम  कि तरह बदलते
परम्पराओं  के साथ
चलाना है जहाँ होता है नित
सदाचार का पालन

अशिक्षा ,अंधविश्वास
को छोड़ पालन करता
परम्पराओं का जहां सदाचार है |

21 जून 2011

तलाश

आधी रात लगे अमावस्या
सी कि कब मिलेगी  निजात
निमग्न करता तलाश

शब्दों के फेर में फंसता
घुटता एक के बाद एक
शब्द फिर होता सूर्योदय
ओर करता सुख का अनुभव |   

3 जून 2011

फिर लौटना पड़ता है

फिर लौटना पड़ता है

उसी पड़ाव में
जिसे छोड़ा है

अमूमन
असलियत
ओर झूठ
के
पड़ावों से

अक्षरों को
पिरोकर
कविताओं के
अंजुमन में

जहाँ चलती है
भाषा हवाओं की |

30 अप्रैल 2011

जिंदगी अनमोल

जिंदगी है अनमोल
जियो खुशी से भर कर
मुश्किलों का सामना
है जिंदगी

जिसने किया डटकर सामना
वही हासिल कर सका जिंदगी
का सही सोपान

कभी हमें कठिन तो कभी
टेढ़े-मेढ़े रास्तों से गुजरना
पड़ता है

संकट के वक्त बुरे कर्मों से
हटकर सचाई के मार्ग से
ही हासिल होता है
जिंदगी का सही सोपान

खटी-मीठी यादों के सहारे
ही मिलती है सफलता की
सीढ़ी







29 अप्रैल 2011

शब्दों के गुंजन


बनते शब्द के वाक्य

बनते शब्द के बोल

शब्दों की भाषा-परिभाषा

विशेषताएं कितने मधुर

लगते ये शब्द के बोल

तिनका-तिनका जोड़कर

रूप आकार प्रदान करते

ये शब्द के बोल गुंजन करते


15 अप्रैल 2011

खुश होने का मतलब

खुश होने का मतलब
हम जो चाहे कर
सकते हैं

भाव विचार संयम
सभी का तालमेल होना
ख़ुशी का मतलब

हमें जो कुछ भी
हासिल होता है
वो ख़ुशी का मतलब

हम जो खापी
सकते हैं
वो ख़ुशी का मतलब

हमारा मिलाना
उठाना बैठना
ये सब ख़ुशी का मतलब

एक दुसरे से वार्तालाप
भी ख़ुशी का मतलब

खुशियों को खरीदना
भी
ख़ुशी का मतलब

मुकेश नेगी, १५-०४-२०११.

11 अप्रैल 2011

जिंदगी एक धुआं

जिंदगी का हर पल
धुएं की तरह उड़ता जाता है
समझ कर भी नासमझ
और नासमझ कर भी
समझना
पड़ता है
कहीं इस धुंए में खो न जाये
यही सोचते हैं अक्सर
कभी चाय की चुस्की
में बीत जाते हैं पल
तो कभी चलचित्रों की
रंगीनियों में कभी बीत जाते हैं
घंटों महफिलों में जिंदगी के
नये नये
दोस्त मश्तक में

मुकेश नेगी, ११-०४-२०११.