14 दिसंबर 2010

बदलाव

बदलाव भूल गए संस्कार जहाँ छोड़ी है अपनी छाप उजवल

भविष्य की कलपना करते हुए पालन करते हैं रुढियों का कचरों के ढेर को जलना भी नहीं भाह्ता आज के शिक्षित समाज को हर कोई आज भुलाने लगा है खेत खलियान ओर आँगन के संस्कार मुकेश नेगी १५-१२-२०१०

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