हाइकु
घूम रहा हूँ
आज भी शहर
दर शहर
आईने जहाँ
दर्पण के रंग
रूप लिये हो
ख़ामोशी के साये
उदासी लिये
फिर रहा हूँ
घूम रहा हूँ
मित्रों के चारों
ओर बंदिश में
घूम रहा हूँ
बनते बिगड़ते
रिश्तों की डोर ।
घूम रहा हूँ
आज भी शहर
दर शहर
आईने जहाँ
दर्पण के रंग
रूप लिये हो
ख़ामोशी के साये
उदासी लिये
फिर रहा हूँ
घूम रहा हूँ
मित्रों के चारों
ओर बंदिश में
घूम रहा हूँ
बनते बिगड़ते
रिश्तों की डोर ।
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