मुझे
ऐसा लगता है
कितनी व्याकुलता है
कितनी निरीहता है
कल जिसके लिए
व्याकुलता थी
सोच कर भी
नहीं समझ पाता हूँ
इस व्याकुलता के
हल नहीं निकल
पाते
जहाँ निरीहता
दूर्दता, भयानक
से लगते हैं
कहीं असमंजसता
तो कहीं व्याकुलता
उभरते हैं ।