9 दिसंबर 2010

लगाव

लगाव
आखिर यह
कैसा लगाव

पल भर में 
मिलाना क्षण भर में
बिछुड़ना 

आधुनिकता की डोर
अपनों से दूर होना
एक सुख को त्याग
दूसरे सुख की तलाश में
ढूँढता फिरता

 नाव 
जो चक्र काटता 
समुद्र के चारों  ओर
पल  प्रतिपल ।

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