अनुभूतियों के विस्मृत-अविस्मृत पल जो कि अबाध गतिविधियों के साथ अग्रसर होता है |
9 दिसंबर 2010
ठहराव
ठहराव रुकी-रुकी सी जीवन की यह घड़ी इंतजार की आखिर कहाँ तक चलेगा यह सफ़र न कोई आसरा न कोई ठिकाना उजाला सा जीवन धुंधला होता जाता है फिर भी हिम्मत जुटाने की कोशिश में रहता है इन्सान यही है जीने की कला
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें